Sama Chakeva : मिथिला का गौरव सामा चकेवा उत्सव

आज हम भाई बहन के पावन उत्सव सामा चकेवा के पीछे की अद्भुत और रोचक कहानी को जानेंगे। 

छठ महापर्व के परना दिन यानि अगले दिन के साथ ही सामा चकेवा उत्सव का शुरुआत हो जाता है । 7 दिन तक चलने वाले सामा चकेवा की शुरुआत मिथिलांचल के लोगों द्वारा किया गया था। यह खासतौर पर मिथिलांचल का  क्षेत्र, नेपाल का तराई क्षेत्र, एवं पूरे बिहार भर में मनाया जाने वाला पर्व है। इसमें बहने अपने भाई के लिए उनके जीवन में खुशहाली तथा मंगल कामना करती है।

मिथिला मे सामा चकेवा पर्व


सामा चकेवा के कुछ  प्रमुख किरदार 

  1.  श्यामा : भगवान कृष्ण की पुत्री
  2.  चारूदत्त : श्यामा की शादी ऋषि कुमार चारूदत्त से हुई थी।  
  3.  शाम्भ: भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र एवं  श्यामा के भाई
  4. चुरक: भगवान श्री कृष्ण के मंत्री (चुरक को ही चुगला बोला जाता है) 
  5. सामा-चकेवा: एक पक्षी का नाम 
  6. सतभैया


सामा चकेवा उत्सव के शुरुआत होने के पीछे की कहानी 

बिहार का एक समृद्ध सांस्कृतिक और एतिहासिक क्षेत्र रहा  है, मिथिला। यहाँ की संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम का विशेष महत्व है। इसी प्रेम को मनाने के लिए हर साल कार्तिक महीने में सामा-चकेवा का त्योहार मनाया जाता है।  इस लोक पर्व का उल्लेख पद्म पुराण मे भी मिलता है, इससे ये  पता चलता है की ये कितनी पौराणिक पर्व है । 

                                                                                                पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान कृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र शाम्भ के बीच बहुत स्नेह था। श्यामा की शादी ऋषि कुमार चारूदत्त से हुई थी। चूंकि  चारुदत ऋषि थे इसलिए श्यामा उनकी पत्नी होने के नाते अन्य ऋषियों का भी सेवा करती थी । एक दिन, श्यामा ऋषि-मुनियों की सेवा करने उनके आश्रम जा रही थी तो श्री कृष्ण के मंत्री चुरक ने देख लिया । भगवान श्री कृष्ण के मंत्री चुरक( जिसको चुगला व कहते है ) को यह बात पसंद नहीं आई और उसने श्यामा के खिलाफ राजा से शिकायत करना शुरू कर दिया। क्रोधित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। श्यामा का पति चारूदत्त ने भी अपने पत्नी श्यामा के जैसे बनने का फ़ैसला किया और शिव की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर स्वयं भी पक्षी का रूप पाने का वर प्राप्त कर लिया।

                                              श्यामा के भाई साम्भ इस बात से बहुत दुखी हुए, और उन्होंने अपने बहन तथा बहनोई को फिर से मनुष्य योनि मे वापस लाने का प्रण किया । इसलिए  साम्भ ने अपने पिता श्री कृष्ण भगवान  की आराधना शुरू कर दी। साम्भ के आराधना से भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होकर साम्भ को श्राप से मुक्ति का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि शरद महीने में सामा-चकेवा पक्षी की जोड़ियां मिथिला में प्रवास करने आती हैं। साम्भ को मिथिला जाकर वहां की महिलाओं से सामा-चकेवा का खेल खेलने के लिए कहना चाहिए। इस खेल से श्यामा और उसके पति  चारूदत्त का श्राप दूर हो जाएगा।

                                                   साम्भ मिथिला पहुंचे और वहां की महिलाओं से सामा-चकेवा का खेल खेलने का आग्रह किया। महिलाओं ने साम्भ की बात मान ली और उन्होंने सामा-चकेवा का खेल खेला। खेल के दौरान, श्यामा और चारूदत्त पक्षी रूप से मिथिला पहुंच गए। इसके बाद उन दोनों को श्राप से मुक्ति मिली और दोनों पुनः वापिस मनुष्य योनि मे लौट आए । इसके बाद भी साम्भ ने  मिथिलांचल के महिलाओं से सामा-चकेवा का खेल जारी रखने का आग्रह किया। महिलाओं ने उनकी बात मान ली और कहा जाता है कि द्वापर युग से यह परंपरा आज भी सामा-चकेवा उत्सव के रूप मे मनाया जाता है।

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सामा चकेवा पर्व कैसे मानते है (Sama Chakeva Festival kaise Manate hai )

इसके लिए सबसे पहले मूर्ति बनाया  जाता  है, पहले यह खुद माहिलाए बनाती थी लेकिन अब इसे कुम्हार के  द्वारा बनाया जाता है जिसमे सामा,चकेवा, चुगला, सतभैया  एवं कुछ पक्षी और अन्य अकृतिया शामिल होती है । छठ पूजा के अगले दिन मूर्तियों को कुम्हार के यहाँ से लाते है एवं उन मूर्तियों को बांस से बने डलिया मे रखते है, और उन्हे अच्छे अच्छे पोशाक पहना कर सजाते है । फिर शाम मे सब माहिलाए अपने अपने सामा चकेवा वाले डलिया को सिर पर रख कर गली से निकलते हुए किसी खुले जगह या चौक पर सारे लोग इकट्ठा होकर आगे गीत गाते हुए सामा चकेवा का पर्व मनाते है । 

यह गीत मैथिली भाषा मे गया जाता है इसमे से कुछ सामा चकेवा के प्रमुख गीत है 

  • सामा खेले चलली भौजी संग सहेली
  • जुग जुग जियो हो
  • हो भैया जिओ हो
  • भईया संघे सामा खेलबई
  • सामा चकेवा खेलब गे बहिना भैया जिवइथ हजार
  •  डललो बहार भेली मैथिली सामा चकेवा गीत
  • साम चके चके आइयह हे जोतला खेत में बैसीह हे 

                             गीतों के माध्यम से पहले अपने इष्ट देवता को प्रसन्न करते है फिर गाना के बोल द्वारा ही चुगला को गाली दिया जाता है, और इसके बाद चुगला को झरकाया (जलाया ) जाता है तथा उसे जूत से पीटने का परंपरा है। यह सातों दिन किया जाता है फिर अंतिम दिन कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि  को सारे बहने अपने भाई का फ़ार भरते है,  जिसमे बहन द्वारा अपने भाई को पाँच मुट्ठी चुरा (पोहा),मूढ़ी और मिठाई या गुड़ दिया जाता है । उसके बाद अंतिम दिन कार्तिक पूर्णिमा को डलिया लेकर नदिया या तलाब मे सामा चकेवा के मूर्ति नम आँखों के साथ विसर्जन कर दिया जाता है । इस तरह से भाई बहन का अटूट बंधन को दर्शाने वाले इस लोक पर्व का समापन हो जाता है । 


FAQs 

सामा चकेवा कहाँ का मुख्य नृत्य है ?

सामा चकेवा नृत्य नहीं है यह एक पावन उत्सव है जो मिथिला के क्षेत्र मे वहाँ के महिलाओ द्वारा मनाया जाता है । यह भाई बहन का एक पावन पर्व है ।

समा चाकेवा क्यों मनाया जाता है ?

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्री श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया था। उसी श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके भाई सांभ द्वारा आराधना करने परने पर भगवान श्रीकृष्ण ने यह खेल खेलने का उपाय बताए थे, तब से यह सामा चकेवा का उत्सव मनाया जाता है ।

सामा चकेवा कब है?

छठ महापर्व के परना दिन यानि अगले दिन के साथ ही सामा चकेवा पर्व का शुरुआत हो जाता है । इस बार यह सोमवार, 20 Nov, 2023 – सोमवार , 27 Nov, 2023 तक है ।